वेदान्त दर्शन में कर्म और ज्ञान
कादम्बरी शर्मा
संस्कृत विभाग, शासकीय संस्कृत महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
कर्म और ज्ञान का विवाद नवीन वेदान्तियों का खड़ा किया हुआ है। वास्तव में शास्त्र में तो ऐसा कोई का विवाद है ही नहीं।
स्वामी शंकराचार्य अपने गीता भाष्य में तीसरे अध्याय के पूर्व-कथन में कर्म-निष्ठा और ज्ञान-निष्ठा का उल्लेख करते हुए लिखते है -
अस्मत् च भिन्नपुरूषानुष्ठेयत्वेन ज्ञानकर्मनिष्ठायोः भगवतः प्रतिवचन-दर्शनात् ज्ञानकर्मणोः समुच्चयानुपपŸिाः।।
अर्थात् - अतएव भगवान् के इस उŸार को कि ज्ञान-निष्ठा और कर्म-निष्ठा का अनुष्ठान करने वाले अधिकारी भिन्न-भिन्न है, देखने से यह सिद्ध होता है कि ज्ञान तथा कर्म का समुच्चय सम्भव नहीं।
स्वामीजी कहते है जगत् के समस्त पदार्थों में प्रियतम वस्तु यही ‘आत्मा’ है। किसी स्थान से प्रिय वस्तुओं की गणना की जाय, पर्यवसान आत्मा में ही होता है। इस विशाल वृŸास्थानीय जगत् का केन्द्र यही आत्मा है। केन्द्र निश्चित है, परन्तु परिधि अनन्त, असीम है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने इसी आत्मा के साक्षात्कार को मोक्ष का स्वरूप बतलाया है। जगत् का कोई भी पदार्थ नित्य नहीं है। आज की चीजें देखते कल नष्ट हो जाती हैं। यदि कोई टिकने वाला अनश्वर पदार्थ है, तो वह आत्मा ही है। इसी का साक्षात् अनुभव करना मानव जीवन का चरम लक्ष्य है। इसके अनुभव के निमिŸा पुत्रवत्सला माता की तरह भगवती श्रुति सुन्दर शब्दों में हमें शिक्षा देती हैं
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आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो
मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।
आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन
मत्या विज्ञानेन सर्व विज्ञातं भवति।।
(वृहदारण्यक 2/4/5)
आत्मा का श्रवण करो, मनन करो तथा ध्यान करो। आत्मा के विज्ञान से सब विज्ञात हो जाता है। आत्मतत्व का श्रवण श्रुति-वाक्यों के द्वारा करना चाहिए, मनन तार्किक युक्तियों से करना चाहिए तथा योगप्रतिपादित उपायों के द्वारा उसका निदिध्यासन करना चाहिए। ये ही तीनों आत्म-दर्शन के उपाय हैं
श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपŸिाभिः।
मत्वा च सततं ध्येयः, एते दर्शन-हेतवः।।
आत्मा के सच्चे स्वरूप का ज्ञान हमें उन्हीं ग्रन्थों से करना चाहिए जिनमें आत्मनिष्ठ ब्रह्यवेŸाा पुरूषों के साक्षात् किये गये अनुभव का संकलन है। ये ही हमारे परम माननीय वेद हैं। श्रवण से ही हमारे कर्तव्य की समाप्ति नहीं होती। मनन की भी आवश्यकता रहती है। युक्तियों के सहारे वेदविहित तथ्यों के स्वरूप को ठीक ढंग से समझना ‘मनन’ है। योग के मार्ग से उस निश्चित तत्व का लगातार चिन्तन करते रहना ‘निदिध्यासन’ है। इन उपायों से आत्माका दर्शन मिलता है।
धर्म का लक्षण महर्षि कणाद के शब्दों में है-
यतोऽभ्युदय-निःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।
अर्थात् जिससे लौकिक उन्नति तथा पारलौकिक कल्याण की सिद्धि हो वही धर्म है। धर्म संसार में उन्नति की काङ्क्षा रखता है, पर उसके पास मोक्ष की सिद्धि भी उसका लक्ष्य है।
इसी को विस्तार से समझाते हुये स्वामी विवेकानंद कहते है कि यदि वह एक ही पर ध्यान दे, तो उसका उद्देश्य कथमपि पूर्ण नहीं कहा जा सकेगा। पाश्चात्य देशों में धर्म दर्शन का बाधक रहा है, साधक नहीं। विरोधी रहा है, सहायक नहीं। परन्तु भारत वर्ष में धर्म और दर्शन में गहरी मैत्री है। दर्शन का आविर्भाव इसीलिए है कि वह तीन तापोंसे सन्तप्त जनता की शान्ति के लिए, क्लेशबहुल संसार से निवृŸिा पाने के लिए, सुन्दर तथा निश्चित मार्ग का उपदेश देता है
‘‘दुःखत्रयाभिघातात् जिज्ञासा तदपघातके हेतौ’।
विचारशास्त्र पण्डितों की कमनीय कल्पना का विजृम्भणमात्र नहीं है, अपितु उसका अधिराज्य इस व्यावहारिक जगतीतल पर है।
दर्शनशास्त्र के द्वारा सुचिन्तित आध्यात्मिक तथ्यों के ऊपर ही भारतीय धर्म की प्रतिष्ठा है। दोनों के मूल आधार वेद ही हैं। जैसा विचार, वैसा आचार। दर्शन विचारों का प्रतिपादन है और इन्हीं विचारों के अनुसार आचारों की व्यवस्था करना धर्म का काम है। दर्शन ‘सिद्धान्त’ का प्रतिपादक है, तो धर्म ‘व्यवहार’ का प्रदर्शक है। बिना धार्मिक आचार के द्वारा कार्यान्वित हुए दर्शन की स्थिति निष्फल है और बिना दार्शनिक विचार के द्वारा परिपुष्ट हुए धर्म की सŸाा अप्रतिष्ठित है। धर्म को अपनी इमारत खड़ा करने के लिए दर्शन नींव रखता है। कोई भी धर्म तब तक विद्वानों का प्रियप्रात्र नहीं बन सकता, जब तक वह दर्शन की नींव पर खड़ा नहीं होता। भारत में इस सामंजस्य का मधुर रूप दिखलाई पड़ता है। धर्म के सहयोग से भारतीय दर्शन की व्यापक व्यावहारिक दृष्टि है और दर्शन की आधारशिला पर प्रतिष्ठित होने के कारण भारतीय धर्म आध्यात्मिकता से अनुप्राणित है तथा वह तर्कहीन विचारों तथा विश्वासों से अपने आपको बचा सका है। दुःख की निवृŸिा की खोज से धर्म उत्पन्न होते है और दुःख की आत्यन्तिक निवृŸिा का एकमात्र उपाय यही ‘दर्शन’ है। परमात्म-दर्शन, परमेश्वर का दर्शन, ब्रह्यलाभ, ‘स्व’ को ‘पर’ में निमग्न कर देना, यही उन्नत दर्शन है। इस प्रकार धर्म की पराकाश्ठा का ही नाम ‘दर्शन’ है। पराकाष्ठा से मतलब यह है कि सच्चे दर्शन से सबका सामंजस्य, सबकी परस्पर अनुकूलता, सबकी तुष्टि और पुष्टि हो जाती है। आत्मदर्शन जिस प्रकार दर्शन का चरम लक्ष्य है, उसी प्रकार यह परमधर्म भी है। स्वामी विवेकानंद मनु और याज्ञवल्क्य के आत्म-दर्शन को ही परमधर्म मानते हैं -
सर्वेषामपि चैतेषामात्मज्ञानं परं स्मृतम्।
तद् ह्यग्रयं सर्वविद्यानां प्राप्यते ततः।।
(मनु. अ. 12)
द्रव्या-चार-दया-हिंसा-यज्ञ-स्वाध्याय कर्मणाम्।
अयं तु परमो धर्मों यद् योगेनात्मदर्शनम्।।
(या. स्मृ.1)
इस पुण्यभूमि भारत में गंगा और यमुना के सम्मिलन के समान धर्म और दर्शन का मधुर मिलन भारतीय संस्कृति के परम सामरस्य का सूचक है। भगवती श्रुति दोनों का मूल है। उस मूल को तिरस्कृत कर देने पर दोनों की स्थिति आपŸिायों से घिरी रहती है। केवल तर्क से किसी बात का ठीक निर्णय नहीं हो सकता। इसलिए श्रुति का आश्रय सदा आदरणीय है। भर्तृहरि ने ‘वाक्यपदीय’ में इस तत्व का विवेचन बहुत ठीक किया है
प्रज्ञा विवेकं लभते भिन्नैरागमदर्शनैः।
कियद् वा शक्यमुन्नेतुं स्वतर्कमनुधावता।।
तŸाद् उत्प्रेक्षमाणानां पुराणौरागमैर्विना।
अनुपासितवृद्धानां विद्या नाति प्रसीदति।।
यही स्वामी जी की धर्म व दर्शन की साराभिव्यक्ति है।
संदर्भ:-
1.
वेदान्त दर्शन - स्वामी शंकराचार्य जी,
2.
भारतीय दर्शन - पं. बलदेव उपाध्याय
3.
धर्म तथा दर्शन - स्वामी विवेकानंद जी, अर्थसंग्रह (जैमिनिकृत) - लौगाक्षी भास्कर
Received on
27.04.2012
Revised on
12.06.2012
Accepted on
15.07.2012
© A&V
Publication all right reserved
Research
J. Humanities and Social Sciences. 3(3): July-September, 2012, 354-355